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वर्ष के अंतिम दिन हमको क्या करना चाहिये? भाग - 1

जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज ने निम्नांकित प्रवचन 31 दिसम्बर सन 2006 को अपने श्रीधाम बरसाना स्थित रँगीली महल आश्रम में दिया था, जिसमें उन्होंने मानव-जीवन के महत्व और उद्देश्य पर विशेष रूप में प्रकाश डाला था और गत वर्ष में हुई लापरवाहियों को दूर करते हुये नववर्ष में अधिकाधिक भगवद-चिन्तन का अभ्यास करने का संकल्प करने का आग्रह किया था। उन्होंने इस व्याख्यान के लिये एक दोहे की रचना की थी। नीचे वह दोहा तथा उसकी व्याख्या के भाग 1 का आप सभी सुधि पाठक-जन लाभ लेवें...

साल साल बीता जाय गोविन्द राधे।

अब तो हठीलो मन हरि में लगा दे।।

(स्वरचित दोहा)

 

आज इस वर्ष का अंतिम दिन है। कल सारे विश्व में हर्ष मनाया जायेगा। लेकिन ये गलत है क्योंकि हर्ष का विषय नहीं है। नया वर्ष आना ये हर्ष का विषय नहीं है, ये शोक का विषय है। जैसे आपके पास बैंक में एक लाख है, उसमें से पचास हजार खर्च हो गया तो आप खुशी नहीं मनाते। आप सोचते हैं, अरे! अब तो पचास ही रह गया, अब तो दो हजार रह गया, अब तो एक हजार रह गया। ऐसे ही ये मानव देह जो भगवान ने हमको अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये दिया है, हमने इसमें कितनी दूरी तय की। भगवान के पास कितना गये? कितनी उपासना की? उपासना माने पास जाना। भगवान के पास जाना, इसका शब्द है उपासना। 

'उप' उपसर्ग है, 'आस' धातु से 'युच्' प्रत्यय होकर 'अन्' होकर, पास होकर उपासना शब्द बनता है। वो भगवान के पास कितना गये? जैसे किसी को ठण्ड लग रही है और सामने आग जल रही है तो वो जितना आग के पास जायेगा उतनी ही ठण्ड दूर होगी।

 

शीतं भयं तमोप्येति साधून् संसेवतस्तथा।

(भागवत 11-26-31)

तो हम भगवान के पास गये, कितने परसेन्ट गये, अब कितनी दूर हैं भगवान। संसार में कितनी दूर गये, ये सब सोचना चाहिये। हम नहीं सोचते। हम खुशी मनाते हैं। अच्छा हुआ, बीस साल निपट गया। अब पचास भी चला गया, अब अस्सी भी चला गया। अपने बेटों से, पोतों से हम लोग बड़े रुआब में कहते हैं, बेटा! हमारी क्या है, हमारी तो बीत गई। तुम अपनी फिकर करो। अरे क्या बीत गई? ये सोचा है क्या मानव देह जो बीत गया। अगर किसी को दस साल की जेल हो, और वो सोचे नौ साल बीत गया, अब साढ़े नौ साल बीत गया, अब कल छूटेंगे तो वो खुशी मनावे, ठीक है। तुम क्या खुशी मना रहे हो? मरने के बाद कहीं मुक्ति होगी क्या? इस चौरासी लाख की जेल से छुटकारा पा जाओगे क्या? ऐसा तो कुछ किया नहीं तुमने अभी और सोचा भी नहीं। फील किया होता तो, मरने के एक सेकण्ड पहले भी अगर फील किया होता, ठीक-ठीक फील किया होता, तो एक सेकण्ड पहले भी मन भगवान में लगा देते तो बात बन जाती।

 

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरं।

(गीता 8-6)

अंतिम समय में जैसा चिन्तन होगा वैसी ही गति मिलती है। तो हमें हर्ष नहीं मनाना है, हमको सोचना है, अपना निरीक्षण करना है, आत्म निरीक्षण।

 

संदर्भित पुस्तक

कृपालु भक्ति धारा (भाग - 3)

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वर्ष के अंतिम दिन हमको क्या करना चाहिये? - 2

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साधक सावधानी


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