Yugal Rasa

Imbued with the nectar of divine love
Availability: In stock
Pages: 222
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जगद्​गुरु श्री कृपालु जी महाराज के अनुसार जीव का चरम लक्ष्य श्री कृष्ण का माधुर्य भाव युक्त निष्काम प्रेम प्राप्ति है तदर्थ श्रवण, कीर्तन और स्मरण तीन प्रकार की भक्ति का अभ्यास करना है। इन तीनों साधनों में भी स्मरण प्रमुख है। अतएव आचार्य श्री येन केन प्रकारेण तत्वज्ञान साधकों के मस्तिष्क में भरने के लिए परमव्याकुल रहते हैं जिससे उनकी प्रेम पिपासा उत्तरोत्तर तीव्र तीव्रतर तीव्रतम हो जाय। एतदर्थ नित्य नवीन नवीन रचनाओं की अमूल्य निधि देकर आचार्य श्री दुर्लभ युगल रस का वितरण कर रहे हैं।

वर्तमान प्रकाशित पुस्तक युगल-रस में १०० पदों का संकलन किया गया है। दिव्य प्रेम से ओतप्रोत पदों में भक्ति संबंधी शास्त्रीय सिद्धांतों का निरूपण अत्यधिक सरस और रोचक है, सर्वसाधारण के लिये ग्राह्य है। इसके अतिरिक्त दैन्य, शृंगार और लीला संबंधी पद भी हैं।
पाठक पढ़ने के बाद स्वयं ही अनुभव करेंगे कि वह ऐसे फल का आस्वादन कर रहे हैं जिसमें न गुठली है, न गूदा है। बस, रस ही रस है, पीने वाला होना चाहिये। युगल रस का यह तृतीय संस्करण अर्थ सहित प्रकाशित किया गया जिससे पाठक और अधिक लाभान्वित हुए। अब चतुर्थ संस्करण भी अर्थ सहित प्रकाशित किया जा रहा है।

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