Rupadhyana (H)

True meditation
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कलियुग में एक मात्र नाम संकीर्तन की ही साधना निर्धारित की गई है। यदि यह भी मान लें कि कलियुग में अन्य साधनों से भगवत्प्राप्ति हो सकती है, तब भी विचारणीय हो जाता है कि इतनी अमूल्य, सरल एवं शीघ्र फल-प्रदान करने वाली संकीर्तन साधना को छोड़कर क्लिष्ट अन्य साधनाओं में प्रवृत्त होने में बुद्धिमत्ता ही क्या है?

किन्तु रूपध्यान संकीर्तन का परम प्रमुख अंग है। रूपध्यान के बिना संकीर्तन शव के समान ही है। इस कराल कलिकाल में अति प्रबल मानसिक कुप्रवृत्तियाँ एवं घोर बहिरंग कुसंग जो जीव को हठात् अपनी ओर खींच कर पतन के गहरे गर्त में गिरा रहा है, इससे निवृत्ति का एक ही उपाय है- रूपध्यान पूर्वक आँसू बहाकर श्रीकृष्ण नाम, रूप, लीला, गुणधाम का संकीर्तन किया जाय। यदि रूपध्यान पूर्वक द्वारा संकीर्तन नहीं किया जाता तो शास्त्रीय आप्त वाणी पर भी सन्देह हो जायगा, क्योंकि साधक यही कहेगा कि इतना नाम संकीर्तन किया किन्तु कुवासनाओं का अत्यन्ताभाव नहीं हुआ। अत: संकीर्तन का तभी लाभ मिलेगा जब रूपध्यान पर पूर्णरूपेण ध्यान दिया जायेगा। क्योंकि जगद्​गुरु श्री कृपालु जी महाराज ही ऐसे आचार्य हैं जिन्होंने भगवन्नाम के विज्ञान को प्रकट करते हुये इस तथ्य को प्रकट किया है कि रूपध्यान ही साधना का प्राण है। प्रस्तुत पुस्तक पढ़ने के बाद भक्तियोग की क्रियात्मक साधना साधक बहुत सुगमता से कर सकता है। अत: सभी भक्ति मार्गीय साधकों के लिए यह पुस्तक परमोपयोगी है।

आचार्य श्री की अकारण करुणा के परिणाम स्वरूप यह अमूल्य निधि आपके हाथ में है दिव्य प्रेम का खजाना जितना लूटना चाहो लूट लो।

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