Raas Panchadhyayi

The divine phenomenon of raas
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Pages: 256
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अनन्त सौन्दर्य माधुर्य सुधासिन्धु बलबंधु श्री कृष्ण की दिव्य लीलाओं के रहस्य को कौन समझ सकता है? अप्राकृत प्रेम राज्य के परमोन्नत स्तर पर हुई रसमयी लीलायें प्राकृत बुद्धि से सर्वथा अज्ञेय हैं। जिस प्रकार भगवान् चिन्मय हैं उसी प्रकार उनकी लीला भी चिन्मय होती है। विशेषरूपेण अपनी ही अन्तरंगा अभिन्न स्वरूपा गोपियों के साथ मधुर लीला तो दिव्यातिदिव्य और सर्वगुह्यतम है।

लगभग 5000 वर्ष पूर्व प्रणत चित्तचोर, रसिक सिरमौर ब्रजेन्द्रनन्दन एवं उनकी ही ह्लादिनी शक्ति, नित्य निकुंजेश्वरी, रासेश्वरी श्री राधा रानी ने अधिकारी, जीवों को सर्वोच्च कक्षा का रस वितरित किया था, जिसे महारास कहते हैं। महालक्ष्मी जो भगवान् की अनादिकालीन पत्‍​नी हैं उनको भी यह रस नहीं मिला। यह रस सर्वथा अनिर्वचनीय है।

प्रस्तुत प्रवचन शृंखला में इस अनिर्वचनीय विषय पर प्रकाश डाला गया है। वस्तुत: यही समझना कठिन है कि रास क्या है, फिर उसमें किस प्रकार प्रवेश मिल सकता है इत्यादि और भी गूढ़ विषय है। आचार्य श्री ने इसे अत्यधिक सरल भाषा में समझाया है। पुस्तक के रूप में यह प्रवचन शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। यद्यपि आचार्य श्री की दिव्यवाणी श्रवण का तो लाभ अवर्णनीय ही है लेकिन पुस्तक की अपनी विशेषता अलग है। ‘आवृत्ति रसकृदुपदेशात्’ शास्त्रोक्ति के अनुसार साधक बार बार पुस्तक अध्ययन द्वारा तत्त्वज्ञान पक्का कर सकता है।

सभी साधकों के लिए यह अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय है और भक्ति साधना में परम सहायक है-

यह पुस्तक ‘प्रवचन माधुरी’ शृंखला में 15 नं. की पुस्तक है।

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