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जे के पी लिटरेचर
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619c917211390338206460bb रास पंचाध्यायी //cdn.storehippo.com/s/61949a48ba23e5af80a5cfdd/619cfffed2ceca38330405be/webp/slide-04-0-00-04-26-.jpg

अनन्त सौन्दर्य माधुर्य सुधासिन्धु बलबंधु श्री कृष्ण की दिव्य लीलाओं के रहस्य को कौन समझ सकता है? अप्राकृत प्रेम राज्य के परमोन्नत स्तर पर हुई रसमयी लीलायें प्राकृत बुद्धि से सर्वथा अज्ञेय हैं। जिस प्रकार भगवान् चिन्मय हैं उसी प्रकार उनकी लीला भी चिन्मय होती है। विशेषरूपेण अपनी ही अन्तरंगा अभिन्न स्वरूपा गोपियों के साथ मधुर लीला तो दिव्यातिदिव्य और सर्वगुह्यतम है।

लगभग 5000 वर्ष पूर्व प्रणत चित्तचोर, रसिक सिरमौर ब्रजेन्द्रनन्दन एवं उनकी ही ह्लादिनी शक्ति, नित्य निकुंजेश्वरी, रासेश्वरी श्री राधा रानी ने अधिकारी, जीवों को सर्वोच्च कक्षा का रस वितरित किया था, जिसे महारास कहते हैं। महालक्ष्मी जो भगवान् की अनिादिकालीन पत्नी हैं उनको भी यह रस नहीं मिला। यह रस सर्वथा अनिर्वचनीय है।

प्रस्तुत पुस्तक में इस अनिर्वचनीय विषय पर प्रकाश डाला गया है। वस्तुत: यही समझना कठिन है कि रास क्या है, फिर उसमें किस प्रकार प्रवेश मिल सकता है इत्यादि और भी गूढ़ विषय है। आचार्य श्री ने इसे अत्यधिक सरल भाषा में समझाया है।

पुस्तक के रूप में यह प्रवचन शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। यद्यपि आचार्य श्री की दिव्यवाणी श्रवण का तो लाभ अवर्णनीय ही है लेकिन पुस्तक की अपनी विशेषता अलग है। ‘आवृत्ति रसकृदुपदेशात्’ शास्त्रोक्ति के अनुसार साधक बार बार पुस्तक अध्ययन द्वारा तत्त्वज्ञान पक्का कर सकता है।

सभी साधकों के लिए यह अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय है और भक्ति साधना में परम सहायक है।

Raas Panchadhyayi - Hindi
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रास पंचाध्यायी

रास पंचाध्यायी

भागवत महापुराण का रहस्य जो आज तक किसी ने नहीं बताया।
भाषा - हिन्दी

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डॉलर में प्रदर्शित मूल्य अमेरिकी डॉलर में है

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विशेषताएं
  • जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज द्वारा दिव्य रास की अलौकिक लीला का निरूपण
  • दिव्यानंद के विभिन्न स्तरों की व्याख्या।
  • भागवत के महत्व और उत्पत्ति की विस्तृत व्याख्या
  • शुकदेव परमहंस और परीक्षित कौन थे?
  • महारास के प्रारंभ में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा मुरली बजाने का रहस्य
प्रकारविक्रेतामूल्यमात्रा

विवरण

अनन्त सौन्दर्य माधुर्य सुधासिन्धु बलबंधु श्री कृष्ण की दिव्य लीलाओं के रहस्य को कौन समझ सकता है? अप्राकृत प्रेम राज्य के परमोन्नत स्तर पर हुई रसमयी लीलायें प्राकृत बुद्धि से सर्वथा अज्ञेय हैं। जिस प्रकार भगवान् चिन्मय हैं उसी प्रकार उनकी लीला भी चिन्मय होती है। विशेषरूपेण अपनी ही अन्तरंगा अभिन्न स्वरूपा गोपियों के साथ मधुर लीला तो दिव्यातिदिव्य और सर्वगुह्यतम है।

लगभग 5000 वर्ष पूर्व प्रणत चित्तचोर, रसिक सिरमौर ब्रजेन्द्रनन्दन एवं उनकी ही ह्लादिनी शक्ति, नित्य निकुंजेश्वरी, रासेश्वरी श्री राधा रानी ने अधिकारी, जीवों को सर्वोच्च कक्षा का रस वितरित किया था, जिसे महारास कहते हैं। महालक्ष्मी जो भगवान् की अनिादिकालीन पत्नी हैं उनको भी यह रस नहीं मिला। यह रस सर्वथा अनिर्वचनीय है।

प्रस्तुत पुस्तक में इस अनिर्वचनीय विषय पर प्रकाश डाला गया है। वस्तुत: यही समझना कठिन है कि रास क्या है, फिर उसमें किस प्रकार प्रवेश मिल सकता है इत्यादि और भी गूढ़ विषय है। आचार्य श्री ने इसे अत्यधिक सरल भाषा में समझाया है।

पुस्तक के रूप में यह प्रवचन शृंखला प्रस्तुत की जा रही है। यद्यपि आचार्य श्री की दिव्यवाणी श्रवण का तो लाभ अवर्णनीय ही है लेकिन पुस्तक की अपनी विशेषता अलग है। ‘आवृत्ति रसकृदुपदेशात्’ शास्त्रोक्ति के अनुसार साधक बार बार पुस्तक अध्ययन द्वारा तत्त्वज्ञान पक्का कर सकता है।

सभी साधकों के लिए यह अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय है और भक्ति साधना में परम सहायक है।

विशेष विवरण

भाषाहिन्दी
शैली / रचना-पद्धतिसिद्धांत
विषयवस्तुअपने वेदों और शास्त्रों को जानें, तत्वज्ञान, महारास
फॉर्मेटपेपरबैक
वर्गीकरणप्रवचन
लेखकजगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
प्रकाशकराधा गोविंद समिति
पृष्ठों की संख्या190
वजन (ग्राम)279
आकार14 सेमी X 22 सेमी X 1.5 सेमी

पाठकों के रिव्यू

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