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जे के पी लिटरेचर
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9789380661216 619c9162614fe946461f3a93 ब्रज रस माधुरी - भाग 2 //cdn.storehippo.com/s/61949a48ba23e5af80a5cfdd/619cbef88ba7248f0dea74f5/webp/braj-ras-madhuri-2.jpg

ब्रजरस रसिक जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, रसिक शिरोमणि, रसरूप श्यामसुन्दर एवं रससिन्धु रासेश्वरी श्री राधारानी की रसमयी लीलाओं का रसास्वादन साधारण जीवों को भी कराने के लिये सदैव आतुर रहते हैं। दिव्य उन्माद की अवस्था में वे रसिक और रसरूप दोनों ही प्रतीत होते हैं। साथ ही यह भी अनुभूति होती है कि वह जीवों को बरबस ब्रजरस वितरित करना चाहते हैं। उनके श्री मुख से नि:सृत संकीर्तन ब्रजरस ही है, पीने वाला होना चाहिये।

‘ब्रजरस माधुरी’ में समस्त संकीर्तन संकलित किये गये हैं। यह पुस्तक तीन भागों में प्रकाशित की गई है।

Braj Ras Madhuri Part 2 - Hindi
in stockUSD 168
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ब्रज रस माधुरी - भाग 2

ब्रज रस माधुरी - भाग 2

श्रीकृष्ण लीलाओं से परिप्लुत कीर्तनों का अनमोल खजाना
भाषा - हिन्दी

$10.5
$22.94   (54%छूट)
डॉलर में प्रदर्शित मूल्य अमेरिकी डॉलर में है


विशेषताएं
  • जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज द्वारा ब्रजरस में सराबोर श्री राधाकृष्ण के नाम, रूप, गुण, लीलाओं की महिमा पर आधारित 100 से भी अधिक भजन
  • गुरु तत्त्व, गुरु कृपा एवं गुरु की उदारता पर आधारित अनेक भजन
  • आत्मा, परमात्मा एवं संसार के स्वरूप ज्ञान युक्त भजन
  • श्री कृष्ण की चंचलतायुक्त मनमोहक बाल लीलाओं की कीर्तनों के माध्यम से विस्तृत व्याख्या
  • श्री राधाकृष्ण का सौन्दर्य, श्रीकृष्ण के सखा एवं श्रीराधा की सखियों के साथ उनकी दिव्य लीलाओं का रमणीक वर्णन
प्रकारविक्रेतामूल्यमात्रा

विवरण

ब्रजरस रसिक जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, रसिक शिरोमणि, रसरूप श्यामसुन्दर एवं रससिन्धु रासेश्वरी श्री राधारानी की रसमयी लीलाओं का रसास्वादन साधारण जीवों को भी कराने के लिये सदैव आतुर रहते हैं। दिव्य उन्माद की अवस्था में वे रसिक और रसरूप दोनों ही प्रतीत होते हैं। साथ ही यह भी अनुभूति होती है कि वह जीवों को बरबस ब्रजरस वितरित करना चाहते हैं। उनके श्री मुख से नि:सृत संकीर्तन ब्रजरस ही है, पीने वाला होना चाहिये।

‘ब्रजरस माधुरी’ में समस्त संकीर्तन संकलित किये गये हैं। यह पुस्तक तीन भागों में प्रकाशित की गई है।

विशेष विवरण

भाषाहिन्दी
शैली / रचना-पद्धतिसंकीर्तन
विषयवस्तुसर्वोत्कृष्ट रचना, भक्ति गीत और भजन, तत्वज्ञान, रूपध्यान
फॉर्मेटपेपरबैक
वर्गीकरणप्रमुख रचना
लेखकजगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
प्रकाशकराधा गोविंद समिति
पृष्ठों की संख्या338
वजन (ग्राम)283
आकार12.5 सेमी X 18 सेमी X 2 सेमी
आई.एस.बी.एन.9789380661216

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