Sorry - this product is no longer available

Prema Rasa Siddhanta - 1 Jiva Ka Charam Lakshya

The ultimate goal of all living beings
READABLE ONLY ON JKBT
$ 3.00
Pages: 30

इस अध्याय में जीव का चरम लक्ष्य क्या है, इस गूढ़ प्रश्न का वैज्ञानिक उदाहरणों द्वारा लॉजिक के साथ समाधान किया गया है जिसे एक सामान्य व्यक्ति भी सरलता से समझ सके एवं अपने वास्तविक लक्ष्य को जानकर मानव जीवन को सफल बना सके।

विश्व का प्रत्येक जीव बिना किसी प्रयोजन के कोई कार्य नहीं करता। कार्य अनन्त होते हुए भी प्रयोजन एक ही है।​ विश्व का प्राणिमात्र एकमात्र आनन्द-प्राप्ति हेतु ही प्रत्येक कार्य करता है। विश्व में सर्वत्र विभिन्नता एवं मतभेद होते हुये भी अल्पज्ञ से लेकर सर्वज्ञ तक, बिना ​किसी के सिखाये ही एकमात्र आनन्द ही क्यों चाहता है? इस शंका का समाधान करते हुये यह बताया गया कि प्रत्येक जीव आनन्दस्वरूप ब्रह्म का अंश है। अतएव अपने अंशी के स्वभाव से युक्त होने के कारण स्वभावतः प्रत्येक जीव एकमात्र आनन्द ही चाहता है।

संसार में सुख नहीं है। यदि कोई कहीं सुखी दिखाई भी पड़ता है तो वह भी भ्रान्ति मात्र है, क्याेंकि सांसारिक सुख अनित्य, सीमित एवं परिणामी है। दुःखनिवृत्ति का लक्ष्य भी दूसरे शब्दों में आनन्द-प्राप्ति ही है।

वास्तविक आनन्द सदा के लिये होता है एवं अनन्तमात्रा का होता है। सीमित मात्रा का होता ही नहीं है, क्योंकि आनन्दप्राप्ति का अभिप्राय ही यह है कि उसके ऊपर फिर कभी भी दुःख का अधिकार न हो सके।

ईश्वर ही आनन्द है, उसे ही प्राप्त करके जीव आनन्दमय हो सकता है। उसको जानकर ही संसारी दुःखों से जीव उत्तीर्ण हो सकता है, अन्य कोई भी मार्ग नहीं है।

विश्व का प्रत्येक जीव आस्तिक ही है। वह करोड़ों कल्प परिश्रम करके भी नास्तिक नहीं बन सकता क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति आनन्द ही चाहता है और आनन्द ईश्वर का ही पर्यायवाची शब्द है। अतएव आनन्द को चाहने वाला ईश्वर को ही चाहता है यह सिद्ध हो जाता है।

अतएव मानव-देह पाकर यदि ईश्वर को नहीं जाना तो जन्म और मृत्यु के चक्र में ही घूमना होगा, उससे बड़ी कोई भूल न होगी। अतएव मानव-देह का महत्व समझकर ईश्वर को समझना है जिससे हम अपने परम चरम लक्ष्य परमानन्द को प्राप्त कर सके।