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Prema Rasa Siddhanta - 9 Jnana and Jnanayoga

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Pages: 19

जैैैसे सांसारिक ज्ञान दो प्रकार का होता है उसी प्रकार ईश्वरीय विषय का ज्ञान भी दो प्रकार का होता है- एक शब्दात्मक ज्ञान, दूसरा अनुभवात्मक ज्ञान। जैसे, ईश्वरीय विषय का शाब्दिक ज्ञान तो प्रचुर मात्रा में हाे, वेद-शास्त्र कंठस्थ हों, प्रवचन भी दे सकता हो, बड़ी-बड़ी बातें बता सकता हो किन्तु स्वयं ने कुछ भी साधना न की हो। यह शाब्दिक ज्ञान है। अनुभवात्मक ईश्वरीय ज्ञान वह है जिसमें वेदों-शास्त्रों में बताये गये पथ पर चलकर ईश्वर को ईश्वरीय कृपा द्वारा जाना हो।

अगर कोई ​ईश्वरीय शाब्दिक ज्ञान प्राप्त कर ले लेकिन उस ज्ञान के अनुसार प्रैक्टिकल साधना न करे तो उसे ज्ञान का मिथ्याभिमान हो जायगा एवं उसका पतन हो जायगा क्योंकि मिथ्याभिमान ही भगवान् से पृथक् करने वाला महान् विरोधी तत्त्व है। लेकिन यदि कोई कहे कि साधना ही करनी चाहिये, शाब्दिक ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं, तो यह सोचना भी मूर्खता है क्योंकि अनन्तानन्त जन्मों के संस्कारों के परिणामस्वरूप जो विचार अन्तःकरण में आ चुके हैं, जो संशय भर गये हैं एवं साधना करते समय जो गड़बड़ी भीतर या बाहर से अचानक आया करती है, उनके ​निवारण के लिये शाब्दिक ज्ञान भी आवश्यक है। शाब्दिक ज्ञान वंदनीय है यदि इसका उपयोग किया जाय। 

ज्ञान तत्त्व को समझाने के पश्चात् ज्ञानयोग और भक्तियोग पर प्रकाश डालते हुये यह बताया गया कि निर्गुण-निराकार-निर्विशेष ब्रह्म की अभेद उपासना का नाम ही ज्ञानयोग है एवं सगुण-सविशेष-साकार भगवान् की भेद-भक्ति का नाम ही भक्तियोग है।

जितनी मात्रा में ईश्वर-भक्ति होती जायगी, उतनी ही मात्रा में स्वाभाविक रूपेण वैराग्य होता जायगा और उतनी ही मात्रा में ईश्वरीय कृपा द्वारा ईश्वरीय ज्ञान होता जायगा। इस प्रकार भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य एक साथ चलेंगे।

बिना भक्ति के, ज्ञान द्वारा कदापि परमानन्द-प्राप्ति का लक्ष्य हल नहीं हो सकता।