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Prema Rasa Siddhanta - 6 Mahapurusha

The saint
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Pages: 43

वैैराग्य के पश्चात् एवं ईश्वर-शरणागति के पूर्व एक तत्त्व मध्य में है, जिसके बिना कार्य नहीं सम्पादित हो सकता। उस तत्त्व का नाम श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष है। श्रोत्रिय माने जिसे सभी शास्त्रों वेदों का पूर्ण ज्ञान हो एवं ब्रह्मनिष्ठ माने जिसने ईश्वर को प्राप्त कर लिया है। ईश्वर की प्राप्ति के लिए वास्तविक गुरु की शरण में जाना होगा। बिना गुरु के अज्ञेय-तत्त्व को नहीं जाना जा सकता। किन्तु गुरु भी सोच समझकर बनाना होगा। आजकल संसार में कई डाकू भी बाबा का भेष बनाकर भोली भाली जनता को भ्रमित कर रहे हैं। ऐसे दम्भी गुरुओं से सावधान रहना होगा। वास्तविक गुरु कभी चेला नहीं बनाता न वो किसी के कान फूँकता है। वह मिथ्या आशीर्वाद नहीं देता एवं शाप भी नहीं देता। महापुरुष निन्दा तथा स्तुति दोनों में समान रहता है।

गुरु केवल साधक को ईश्वर संबंधी साधना में मार्गदर्शन करता है एवं साधना करते-करते जब साधक का मन एवं बुद्धि निर्मल हो जाती है, छल कपटरहित होकर वह ईश्वर के पूर्ण शरणागत हो जाता है तभी गुरु उसे दिव्य प्रेम प्रदान करता है। वही असली दीक्षा है। 

महापुरुषों के बहिरंग व्यवहार संसारी व्यक्ति की ही भाँति दिखाई पड़ते हैं, जबकि वे मायातीत भगवत्प्राप्त महापुरुष हैं। महापुरुषों को साधारण बुद्धि से पहचानना अत्यधिक कठिन है। अतः महापुरुष को पहचानने के अनेक प्रमाण भी यहाँ स्पष्ट किये गये हैं।