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Prema Rasa Siddhanta - 5 Atma Sansara Vairagya Svarupa

The soul, material world and detachment
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Pages: 41

आत्म-स्वरूप 

‘मैं’ माने वास्तव में कौन है, यह गूढ़ रहस्य इस अध्याय में विभिन्न उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया गया। ‘मैं’ माने शरीर नहीं है। ‘मैं’ माने इन्द्रिय, मन या बुद्धि भी नहीं अपितु ‘मैं’ माने आत्मा है। आत्मा ईश्वर का अनादिकालीन नित्य अंश है। अतएव हमारा सुख ईश्वरीय होगा। ‘मैं’ दिव्य तत्त्व हूँ अतएव जब तक ईश्वर प्रेम न प्राप्त हो जायगा तब तक बड़े से बड़े संसार के वैभव आदि पाकर भी ‘मैं’ अर्थात् आत्मा आनन्दमय नहीं हो सकता।  

संसार का स्वरूप 

माया एक ईश्वरीय अनादि शक्ति है। संसार माया से बना है। संसार दो प्रकार का होता है, एक वासनात्मक संसार, दूसरा स्थूल संसार। इन दोनों में क्या भेद है यह इस अध्याय में स्पष्ट किया गया।   

पश्चात् संसार का स्वरूप समझाते हुये बताया गया कि संसार में प्रत्येक व्यक्ति संसारी पदार्थों द्वारा आनन्द प्राप्त करने के लिये निरन्तर प्रयत्न कर रहा है परन्तु वह नित्य आनन्द उसे कभी प्राप्त नहीं हुआ। क्योंकि संसार में वास्तविक सुख नहीं है। संसार में प्राप्त होने वाले सुख क्षणिक हैं, यह भी शास्त्रों वेदों के प्रमाणों तथा दैनंदिन उदाहरणों द्वारा अत्यधिक सरलता से सिद्ध किया गया।   

जिस व्यक्ति को जिस वस्तु के मिलने पर जितना आनन्द मिलता है उस व्यक्ति को उस वस्तु के छिन जाने पर उतना ही दुःख भी मिलता है। वस्तुतः उस वस्तु में सुख या दुःख नहीं होता, वह हमारी ही काल्पनिक मान्यता का परिणाम मात्र है।  

वैराग्य का स्वरूप 

अनुकूल भाव या प्रतिकूल भाव, किसी भी भाव से मन की आसक्ति, आसक्ति ही कहलाएगी और जब न अनुकूल भाव से आसक्ति हो और न प्रतिकूल भाव से आसक्ति हो तभी वैराग्य कहलायेगा। जब तक संसार में, “न तो यहाँ हमारा आध्यात्मिक सुख है और न यहाँ हमें बरबस अशान्त करने वाला दुःख ही है”, ऐसा ज्ञान परिपक्व न होगा, तब तक वैराग्य असम्भव है। 

पुनः एक प्रश्न आता है कि व्यर्थ में वैराग्य के चक्कर में क्यों पड़ा जाय, सीधे-सीधे ईश्वर में अनुराग करो बस, वैराग्य अपने आप हो जायगा। किन्तु विचारणीय यह है कि ईश्वर में अनुराग करोगे किससे एवं किसलिये करोगे? इन सभी शंकाओं का समाधान इस अध्याय में किया गया है।