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Prema Rasa Siddhanta - 14 Kusanga

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संसार में सत्य एवं असत्य केवल दो ही तत्त्व हैं, जिनके संग को ही सत्संग एवं कुसंग कहते हैं। सत्य पदार्थ हरि एवं हरिजन ही हैं। अतएव केवल हरि, हरिजन का मन-बुद्धि-युक्त सर्वभाव से संग करना ही सत्संग है तथा उसके विपरीत जो भी अन्य विषय हैं, सत्त्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण से युक्त होने के कारण मायिक हैं, अतएव असत्य हैं।

जिस किसी भी संग के द्वारा हमारा भगवद्विषय में मनबुद्धि-युक्त लगाव हो वही सत्संग है। इसके अतिरिक्त समस्त विषय कुसंग हैं। कुसंग कई प्रकार का होता है। एक तो भगवद्विषय से विपरीत विषयों का पढ़ना, दूसरे सुनना, तीसरे देखना, चौथे सोचना आदि। किन्तु इन सबसे भयानक कुसंग सोचना ही है, क्योंकि अन्त में पढ़ने, सुनने एवं देखने आदि वाले कुसंग भी यहीं पर आ जाते हैं। कुसंग में पड़ जाने पर स्वयं मन-बुद्धि का भी तदनुकूल ही निर्णय हो जाता है, जिससे साधक स्वयं अपनी बुद्धि से यह निर्णय नहीं कर पाता कि मैं कुसंग में पड़ गया हूँ।

भगवत्प्राप्ति के पूर्व किसी भी जीव को यह दावा करने का अधिकार नहीं है कि कुसंग मेरा कुछ भी नहीं कर सकता। एक क्षण का भी कुसंग साधक को गिरा देने में पूर्ण समर्थ है। साधकों को साधना से भी अधिक दृष्टिकोण कुसंग से बचने पर रखना चाहिये।