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Prema Rasa Siddhanta - 13 Karmayoga

The practical sadhana
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कर्म दो प्रकार का होता है— एक तो वह जिसमें केवल मन-बुद्धि का संयोग होता है किन्तु आसक्ति नहीं होती, दूसरा कर्म वह जिसमें मन-बुद्धि के संयोग के साथ मन-बुद्धि की आसक्ति भी होती है। यदि इन दोनों का अन्तर समझ में आ जाय तो कर्मयोग का क्रियात्मक रहस्य समझ में आ जाय। इसी विषय को अनेक दैनंदिन उदाहरणों द्वारा इस अध्याय में विस्तृत रूप से समझाया गया है।

कर्मयोग माने मन से निरन्तर भगवान् का स्मरण हो एवं शरीर से मन-बुद्धि युक्त होकर संसार के कर्म किये जायें। उन कर्मों में सुख का अनुभव नहीं करना है।

यदि ईश्वर से प्यार करें एवं संसार में व्यवहार करें तो हमारा व्यवहार भी ठीक-ठीक चले एवं ईश्वर प्राप्ति की समस्या भी हल हो जाय।

कर्मयोग की क्रियात्मक साधना में दो बातें समझना परम आवश्यक है— अनन्यता एवं रूपध्यान।