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Prema Rasa Siddhanta - 12 Bhaktiyoga

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Pages: 24

सगुण-सविशेष-साकार भगवान् की भेद-भक्ति का नाम ही भक्तियोग है। श्यामसुन्दर की भक्ति ही सर्वोपरि तत्त्व है। वह भक्ति की नहीं जाती एवं अपने आप हो भी नहीं जाती वरन् वह तो एक परम अन्तरंग ईश्वरीय शक्ति का नाम है। अतएव वह भक्तिरूपी शक्ति एकमात्र ईश्वर के ही पास है। किसी मूल्य पर अमूल्य वस्तु नहीं मिला करती।

संक्षेपतः तीन बातें भक्ति में प्रमुख ज्ञातव्य हैं। उन तीनों में प्रथम तो यह है कि अन्य सब प्रकार की इच्छाओं से रहित हुआ जाय। अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों कामनाओं का परित्याग करना होगा। दूसरी यह कि भक्ति के ऊपर ज्ञान, कर्म, तपश्चर्या आदि किसी का भी आवरण नहीं होना चाहिये। तीसरी बात यह है कि शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य एवं माधुर्य इन पाँच अनुकूल भावों से श्रीकृष्ण से प्रेम करना चाहिए। इन पाँचों में भी माधुर्य भाव सर्वश्रेष्ठ बताया गया। उसी भाव से उपासना करने से सर्वश्रेष्ठ रस की उपलब्धि हो सकती है। माधुर्य भाव का मोटा सा अभिप्राय यह है कि श्रीकृष्ण ही हमारे सर्वस्व हैं हम उन्हें जब जो चाहे मान लें। सब भाव में पूर्ण अधिकार रहे एवं कहीं मर्यादा का निरोध न हो।