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Prema Rasa Siddhanta - 8 Karma

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Pages: 33

कर्मकांड (वेदों-शास्त्रों में बताये गये विधिवत् कर्म) का फल स्वर्गलोक है; वह क्षणभंगुर है, मायिक है, अतएव कर्म करना घोर मूर्खता है।

पुण्य कर्मों के फलस्वरूप स्वर्ग कुछ दिनों के लिए मिलता है पश्चात् पुनः कर्मबन्धन द्वारा मृत्युलोक में वापस आना पड़ता है। अतएव कर्म निन्दनीय है। 

कर्म का अन्तरंग रहस्य समझने के लिये चार तत्त्व समझने होंगे— कर्म, विकर्म, अकर्म अथवा कर्मयोग एवं कर्मसंन्यास।

कर्म उसे कहते हैं जिसमें वेदों में बताये गये विधिवत् कर्म करे किन्तु ईश्वर भक्ति न करे।

विकर्म उसे कहते हैं जिसमें वेदों द्वारा प्रतिपादित कर्म भी न करे एवं ईश्वर-भक्ति भी न करे।

अकर्म अथवा कर्मयोग उसे कहते हैं जिसमें अन्तःकरण से तो ईश्वर की भक्ति की जाय किन्तु शरीर से कर्मकांड भी किये जायें।

कर्मसंन्यास उसे कहते हैं जिसमें ईश्वर-भक्ति तो कर्मयोगी की भाँति ही हो किन्तु वेदादि-प्रतिपादित कर्म न हो।

अतएव इन चारों में कौन सा कर्म अनुकरणीय है और किससे हमारा काम बनेगा, इन सभी प्रश्नों का विस्तृत विवेचन इस अध्याय में किया गया है।