Lila Samvaran (H) - Paperback

(New Edition)
The Disappearance of Jagadguruttam
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Pages: 192
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लेखनी कठोर हो गई, जो इस लीला का वर्णन करने जा रही है। चलती है, फिर रुक जाती है। कैसे लिखी जाय उस कृपास्वरूप की यह लीला, जिसका सनातन नित्य स्वरूप उसकी उपस्थिति हर क्षण, हर साधक के हृदय में है। कोई भी यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि हमारे गुरुवर, हमारे कर्णधार, हमारे पथ-प्रदर्शक, हमारे मध्य नहीं हैं। उन्होंने अपनी प्रकट लीलाओं को भक्ति-धाम में विराम दिया किन्तु उनके दिव्य धाम में तो अविराम नित्यनिकुंज लीला चलती है। यह लिखना भी अनुचित सा ही लगता है कि उन्होंने नित्य निकुंज लीला में प्रवेश किया। प्रवेश तो साधन-सिद्ध महापुरुष का होता है। फिर उनके प्रियजनों का तो यह पूर्ण विश्वास है कि नित्य निकुंज विहारिणी ह्लादिनी शक्ति का ही तो प्राकट्य जगद्​गुरूत्तम कृपालु रूप में हुआ, तो फिर उनकी लीलायें तो नित्य ही हैं। बस ऐसा ही कहा जाय, वे अब इन आँखों से ओझल हो गये। जो प्राकृत इन्द्रियों ने उनकी मधुरातिमधुर लीलाओं का रसपान किया, वह अब दिव्य इन्द्रियों के द्वारा ही सम्भव होगा, किन्तु उन्हीं की वाणी में -
एक दिन तू देगी दर्शन है भरोसा राधे।
इसी विश्वास इसी आशा पर जीवित रहना होगा, वे अवश्य दर्शन देंगे। उन्हीं के श्री चरणों में प्रार्थना है कि जो उन्होंने समस्तशास्त्रीय सिद्धान्तों का सार स्वरूप अमूल्य खजाना प्रदान किया है, उसी में उनका दर्शन करते हुये, उनके सिद्धान्तों का अनुसरण करते हुये, अपना जीवन व्यतीत करें।

The Disappearance of Jagadguruttam

This special souvenir describes the last journey of our Beloved Master, Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj. It is very, very difficult to pen this sorrowful event. The mind stops functioning and the pen falters again and again. Moreover, it is enigmatic. Every one of us experiences his divine presence everywhere, though physically he is not seen. No one is ready to accept the bitter truth that he has left. He is still taking care of us in the same way, as our spiritual guide, our protector, our loving guardian and as a proficient helmsman, to sail us across the ocean of mundane existence.

He has concluded his visible pastimes in Bhakti Dham, but in his divine abode, these loving pastimes continue eternally...

His disappearance torments the heart. It leaves all his dear ones just to lament, but everyone has faith – ek dina tu degi darshan, hai bharosa radhe – that one day he will definitely reappear in some form to console us. This hope is now the only support to survive.

All devotees together pray in full submission unto his lotus feet,

Let us experience Your divine presence in the spiritual treasure revealed by you - through your discourses, in your sankirtans and in your literary works. Let us be fully devoted in your service, adhering to your every instruction.