Lila Madhuri

(Vol. 1-2)
The sweetness of divine pastimes
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Pages: 496
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समस्त वेदों शास्त्रों पुराणों आदि के द्वारा यह निर्विवाद सिद्ध सिद्धान्त है कि प्रत्येक जीव का चरम लक्ष्य आनन्द प्राप्ति ही है और वह आनन्द या रस स्वयं रसिक शिरोमणि श्री कृष्ण ही हैं किन्तु उन आनन्द स्वरूप, आनन्दकन्द श्री कृष्ण चन्द्र को भी क्रीतदास बनाने वाला उन्हीं का परमांतरंग प्रेम तत्त्व है। तथा यही आन्तिक तत्व है। इसी प्रेम रस का लक्ष्य बनाकर जगद्​गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने प्रेम रस मदिरा ग्रन्थ की रचना की। जिसमें १००८ पद है प्रत्येक पद गागर में सागर ही है। १००८ पदों को २१ माधुरियों में विभक्त किया गया है। यह समस्त माधुरियाँ प्रेम रस की मधुरिमा से ओतप्रोत है। इनमें श्री राधाकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का वर्णन, वेद शास्त्र पुराणादि सम्मत एवं अनेक महापुरुषों की वाणियों के मतानुसार किया गया है।

इन पदों में छिपे सौरस्य माधुर्य का वर्णन वे स्वयं ही कर सकते कोई भी कैसे समझ सकता है, उनके दिव्य भाव को। उनकी असीम अनुकम्पा है कि सन् १९८५ शरत्पूर्णिमा साधना शिविर में उन्होंने प्रेम रस मदिरा के कुछ पदों की व्याख्या की थी, वही ‘लीला माधुरी’ नाम से दो भागों में प्रकाशित की जा रही है। साधक बहुत समय से इन लीलाओं को सुनने के बाद पुन: प्रेमाग्रह कर रहे थे कि ये पुस्तक रूप में भी पढ़ने को मिल जाये तो साधना में अत्यधिक सहायता मिलेगी।

श्री महाराज जी ने इतने सरस और रोचक ढंग से व्याख्या की है कि कोई भी पाठक पढ़ने मात्र से लीला जगत में प्रवेश कर जायेगा।

श्री सद्​गुरु सरकार के चरणों में ही समर्पित है यह अमूल्य ग्रन्थ।

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