Holi 2012

The teachings and works inspired by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
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Pages: 64
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जो सदैव प्रेमानन्द में निमग्न मानो श्यामा-श्याम के मूर्तिमान रसावतार ही हैं, ऐसे श्री प्रिया-प्रियतम के प्रेम रस रसिक जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज द्वारा श्री वृन्दावन धाम को समर्पित दिव्योपहार ‘प्रेम मन्दिर’ युगों युगों तक प्रेम की अजस्र धारा प्रवाहित करता रहेगा। जो भी वृन्दावन आता है मन्दिर की भव्यता, उत्कृष्टता देखकर अवाक् रह जाता है। बरबस बोल उठता है- ‘‘इस मन्दिर का निर्माण हुआ है या यह गोलोक से अवतरित है।’’ जहाँ भी दृष्टि जाती है प्रिया-प्रियतम की मधुर लीलायें मानस पटल पर अंकित होकर सहज ही श्यामा-श्याम का स्मरण करा देती हैं। प्रेमोन्मत्त दर्शनार्थी समझ नहीं पाता कि वह त्रेता के सीता-राम की प्रेम धारा में बँध गया है या द्वापर में प्रकटे श्यामा-श्याम के सौन्दर्य माधुर्य का सदा सदा को दास बनकर प्रेम रस सिन्धु में गोते लगा रहा है अथवा समस्त ब्रज महारसिकों
ने जिस ब्रज रस की वर्षा की है, वह एक जगह एकत्र होकर निरन्तर मूसलाधार वर्षा कर रही है जिसमें वह सराबोर होता जा रहा है। जो भी भक्त आता है ठगा सा खड़ा रह जाता है, समय को भूल जाता है, पीछे से आकर कोई कहता है ‘‘और भी भक्त व्याकुलता से प्रतीक्षा कर रहे हैं। कृपया उनको भी आने दीजिये।’’ ऐसामनमोहक है यह ‘प्रेम मन्दिर’! इस अंक में ‘प्रेम मन्दिर’ उद्घाटन एवं प्राण प्रतिष्ठा समारोह का संक्षिप्त निरूपण किया जा रहा है।

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