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"एक भगवदप्राप्त संत के पास एक अलौकिक निधि होती है - भगवान का दिव्य प्रेम - जिसे वह छिपाने का पूरा प्रयास करता है। लेकिन कभी-कभी, अपनी पूरी कोशिश के बाद भी वह भगवान के प्रति अपने प्रेम को नियंत्रित या छिपा नहीं पाता और उस प्रेम की झलक संसार के सामने प्रकट हो जाती है ... एक महापुरुष में ऐसे दिव्य महाभाव के लक्षण प्रकट होते देख, आप थोड़ा बहुत अनुमान लगा सकते हैं कि उसके भीतर दिव्य प्रेम का अथाह सागर भरा हुआ है ..." जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज

आजकल, आध्यात्मिकता के नाम पर हो रहे पाखंड के चलते, यह स्पष्ट करना आवश्यक हो गया है कि हमारे शास्त्रों के अनुसार वास्तविक संत कौन है और उस संत की पहचान कैसे की जा सकती है।

जगदगुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज भारत में तथाकथित गुरुओं की बढ़ती संख्या के बारे में बहुत खुल कर बोलते थे - ऐसे पाखंडी जो आध्यात्मिकता के नाम पर विभिन्न दावे करते हैं और बिना किसी शास्त्रीय ज्ञान के, जनता को अपने स्वार्थ के लिए, उनकी सांसारिक इच्छाओं को पूरा करने का  कर के भ्रमित करते हैं।

इस छोटी सी पुस्तक में, श्री महाराज जी ने इस बात को इतने सरल तरीके से समझाया है कि कोई भी, चाहे उनकी समझ का स्तर कुछ भी हो, वो ये अच्छी तरह से समझ जाएगा कि किसे अपने आध्यात्मिक मार्गदर्शक या गुरु के रूप में स्वीकार करना चाहिए।

Guru Kaun? - Hindi
in stockINR 50
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गुरु कौन? - हिन्दी

गुरु कौन? - हिन्दी

वास्तविक संत को पहचानने का मार्गदर्शन
भाषा - हिन्दी

₹50


विशेषताएं
  • वास्तविक गुरु चुनने की विधि ।
  • पाखंड के संकेत।
  • वास्तविक संत को पहचानने की कुंजी।
  • संत की दिव्यता के संकेत।
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प्रकारविक्रेतामूल्यमात्रा

विवरण

"एक भगवदप्राप्त संत के पास एक अलौकिक निधि होती है - भगवान का दिव्य प्रेम - जिसे वह छिपाने का पूरा प्रयास करता है। लेकिन कभी-कभी, अपनी पूरी कोशिश के बाद भी वह भगवान के प्रति अपने प्रेम को नियंत्रित या छिपा नहीं पाता और उस प्रेम की झलक संसार के सामने प्रकट हो जाती है ... एक महापुरुष में ऐसे दिव्य महाभाव के लक्षण प्रकट होते देख, आप थोड़ा बहुत अनुमान लगा सकते हैं कि उसके भीतर दिव्य प्रेम का अथाह सागर भरा हुआ है ..." जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज

आजकल, आध्यात्मिकता के नाम पर हो रहे पाखंड के चलते, यह स्पष्ट करना आवश्यक हो गया है कि हमारे शास्त्रों के अनुसार वास्तविक संत कौन है और उस संत की पहचान कैसे की जा सकती है।

जगदगुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज भारत में तथाकथित गुरुओं की बढ़ती संख्या के बारे में बहुत खुल कर बोलते थे - ऐसे पाखंडी जो आध्यात्मिकता के नाम पर विभिन्न दावे करते हैं और बिना किसी शास्त्रीय ज्ञान के, जनता को अपने स्वार्थ के लिए, उनकी सांसारिक इच्छाओं को पूरा करने का  कर के भ्रमित करते हैं।

इस छोटी सी पुस्तक में, श्री महाराज जी ने इस बात को इतने सरल तरीके से समझाया है कि कोई भी, चाहे उनकी समझ का स्तर कुछ भी हो, वो ये अच्छी तरह से समझ जाएगा कि किसे अपने आध्यात्मिक मार्गदर्शक या गुरु के रूप में स्वीकार करना चाहिए।

विशेष विवरण

भाषाहिन्दी
शैली / रचना-पद्धतिसिद्धांत
फॉर्मेटपेपरबैक
लेखकजगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
प्रकाशकराधा गोविंद समिति
आकार16 सेमी x 10 सेमी x 0.4 सेमी
पृष्ठों की संख्या34
वजन (ग्राम)45

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