Guru Kripa (H)

The nature of Guru's grace
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Pages: 76
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भगवत्कृपा का सबसे पक्का प्रमाण, भगवज्जन मिलन है, कृपा से लाभ लेना तभी संभव है, जब इस कृपा को बार-बार चिन्तन में लाया जाय। भगवज्जन का यदि दर्शन मात्र प्राप्त हो जाय तो बार-बार चिन्तन कर आनन्द विभोर होना चाहिए क्योंकि उसके दर्शन को पाने या दिलाने की सामर्थ्य किसी भी साधना में नहीं है। यदि दर्शन के अतिरिक्त और भी सामीप्य मिल जाय फिर तो बात ही क्या है। यदि उस अमूल्य निधि को पाकर भी साधारण भावना या चिन्तन रहा तो महान् कृतघ्‍​नता एवं महान् दुर्भाग्य ही होगा, क्योंकि इससे अधिक हमें क्या पाना शेष है।

गुरु कृपा के बारे में न कोई लिख सकता है न कोई जान सकता है। हमारे चिन्तन पर निर्भर करता है कि हम उनका कितना मूल्य समझते हैं। वे तो कृपालु ही हैं, केवल कृपा ही करते हैं जिस दिन हम सेन्ट परसेन्ट उन्हें कृपालु मान लेंगे बस फिर वे तुरन्त दिव्य प्रेम देकर मालामाल कर देंगे। प्रस्तुत पुस्तक में गुरु कृपा से सम्बन्धित कुछ सामग्री प्रकाशित की जा रही है आशा है इसे बार-बार पढ़ने से गुरु कृपा का कुछ अनुमान लगा सकेंगे जिसका पुन:-पुन: चिन्तन साधना में अवश्य सहायक सिद्ध होगा।

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