हमारा पिता भगवान् हमारे लिये क्या-क्या करता है - What does our father, God do for us?

उर में सदा से रह गोविंद राधे।
जीव ब्रह्म सुत पितु संग बता दे॥ 

फादर्स-डे के उपलक्ष्य में हमने पिछले सप्ताह श्री महाराज जी द्वारा इस पद की भाग -1 व्याख्या प्रकाशित की थी, जिसमें हमने पढ़ा था कि किस प्रकार भगवान् जीव के साथ एक सनातन पिता की भाँति सदा संग रहता है। अब इस भाग में आइये जानते हैं कि हमारा पिता भगवान् हमारे लिये क्या-क्या करता है, वो भी निस्वार्थ बिना कुछ चाहे।

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भाग -2

तो भगवान् साथ नहीं छोड़ते कभी, मरने के बाद भी। गर्भ से लेकर सर्वत्र जहाँ-जहाँ आप जायेंगे वो साथ रहेंगे। तो भगवान्, गधे की योनि में हम जायेंगे तब भी रहेंगे। हाँ रहना पड़ता है उनको और सबके कर्मों का लेखाजोखा बही-खाता ले के बैठते हैं। कुत्ता बन गया। हाँ। लेकिन कैसा कुत्ता? एक कुत्ता होता है 'बुलडॉग' कार में घूमता हैं। माल-टाल खाता है। एक कुत्ता दिन भर घूमता है फिर भी भूखे पेट सो जाता है।

देखो ! मनुष्यों में एक आदमी अरबपति है, खरबपति है, बिलगेट्स है और एक बेचारा दिन भर, ऐ बाबूजी! एक पैसा दे दो ऐसा करता है, कभी पेट भरा, कभी आधा पेट मिला। ऐसे ही सब योनियों में हैं। जंगलों में जितने जानवर रहते हैं इनके जीवन का क्या भरोसा है। ये हिरन है, ये गाय है, ये बैल है, आया शेर और झपट्टा मारा और गिरा के, मार के खा लिया। कुछ नहीं कर सकता। एक मछली दूसरी मछली को खा गई वो कुछ नहीं कर सकती। इतना सब दुःख आप सब भोग चुके हैं। याद नहीं होगा आप लोगों को। भगवान् कहते हैं अर्जुन!

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप॥

(गीता ४-५)

'सर्वाणि' तेरे अनन्त जन्मों का हिसाब मेरे पास है। ये कमाल है, एक भगवान्। अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड में प्रत्येक ब्रह्माण्ड के प्रत्येक लोक के प्रत्येक देश के प्रत्येक प्रान्त के प्रत्येक ग्राम के प्रत्येक पोखरे में रहने वाले करोड़ों जीवों के अनन्त जन्मों के प्रत्येक क्षण के, प्रत्येक संकल्प और कर्म को नोट किये बैठा है, एक भगवान् ! शक्ति भी देता है, चेतना और कर्म का फल भी देता है। एक ने अच्छे कर्म किये हैं अच्छा फल दे रहा है, एक ने खराब कर्म किया है खराब फल दे रहा है और वो भोला-भाला व्यक्ति कहता है, देखो! क्या भगवान् के यहाँ न्याय है? पड़ौसी के छ: लड़के थे, सातवाँ हो गया, हमारे एक था वो मर गया। कैसा है तुम्हारा भगवान् ? अरे भाई, तुमने ऐसे ही कर्म किया था। भगवान् से कोई मतलब नहीं है, वो तो जज है। उसका कहीं न राग है न द्वेष है न किसी से स्वार्थ है, न उसके स्वार्थ का कोई नुकसान कर सकता है। वो तो न्याय करता है।

जो जस करइ सो तस फल चाखा।

तो अनादिकाल से वो पिता अपने पुत्र के साथ कृपा करता हुआ उसकी रखवाली करता हुआ, देखभाल करता हुआ संग-संग रहता है। संसारी पिता अगर कुछ दिन हमारी रक्षा करता है, पालन-पोषण करता है तो वहाँ भी स्वार्थ छुपा रहता है। ये बड़ा होगा हम बूढ़े होंगे तो हमारी सेवा करेगा। मरने के बाद ये श्राद्ध तर्पण करके हमको बैकुण्ठ भेज देगा। बड़ी-बड़ी प्लानिंग भीतर से है। पड़ोसी के बच्चे को तो कुछ नहीं करता वो। अपने बच्चे को करता है स्वार्थ के लिये। राम ने एक बार अयोध्या में लेक्चर दिया एक बार, ग्यारह हजार वर्ष में एक स्पीच हुई है राम की। बस । बड़े लोग बहुत कम बोलते हैं। हाँ हमारी तरह बक बक नहीं करते रहते हैं भगवान्। (परिहास)

एक बार रघुनाथ बुलाये।

सब पब्लिक आई और उन्होंने उपदेश दिया-

त्यागहिं कर्म शुभाशुभ दायक। भजहिं मोहिं सुर नर मुनि नायक॥

सब कर्म, धर्म, पाप, पुण्य सब छोड़ दो केवल मेरा भजन करो तो मेरे लोक में आओगे। जब जनता ने सुना लेक्चर तो बाद में कहा-

तुम बिन अस सिख देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथ रत ओऊ॥

वो भी स्वार्थी होते हैं माँ, बाप, भाई, बहिन, बेटा, स्त्री, पति सब अपनेअपने सुख के लिये ये प्यार की एक्टिंग करते हैं या सेवा की एक्टिंग करते हैं। सेवा। स्त्री रात भर जाग रही है पति बीमार है, क्या क्यों जाग रही है, सेवा कर रहे हैं। अरे ये सेवा सेवा नहीं है ये इसलिये है कि अगर ये मर जायगा तो फिर हमारा क्या होगा। ये मरने न पावे इसलिये जागो। नम्बर दो अगर इसके बीमार होने पर नहीं जागेंगे तो हमारे बीमार होने पर ये भी नहीं जागेगा। खर्राटे में सोयेगा, ये तमाम बिजनेस है।

अरे जिन्दा की तो बात छोड़ो। आप लोग जब मरते हैं तो मरने पर क्या होता है? उसके मरने पर एक हजार आदमी गया, उसके मरने पर दस हजार आदमी की भीड़ हुई। अरे वो तो मर गया अब इस भीड़ से क्या मतलब है? अरे वो जो हमको जाना पड़ा वहाँ क्योंकि हम मरेंगे तो वो भी हमारे यहाँ आवे और कहीं तुमसे पहले ही वो मर गया तो। तो बिजनेस में घाटा भी होता है। हाँ, ये हाल है हमारे संसार का। तो हमारा वो पिता भगवान् हमसे कुछ नहीं चाहता। क्योंकि वो परिपूर्ण है।

 

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