Gita Ka Saar

Lord Shri Krishna Song to Arjun

भगवान् श्री कृष्ण द्वारा मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष एकादशी को दिये गये उपदेश को, जिसे हम श्रीमद् भगवत गीता के रूप में जानते हैं, अनेकों संतों और उपदेशकों ने ही नहीं बल्कि अनगिनत स्वदेशियों एवं विदेशियों ने अपना प्रेरणा स्रोत स्वीकार किया है।  यही कारण है कि आज 75 भाषाओं में अनुवादित श्रीमद् भगवत गीता संपूर्ण विश्व में सबसे प्रचलित धार्मिक ग्रंथ है। और धर्म-जाति से परे सिद्धांतों से पूर्ण, धर्मनिरपेक्ष भारत का राष्ट्रीय ग्रंथ भी।

श्री महाराज श्री ने अपनी अनेकों रचनाओं में विभिन्न प्रकार से गीता के गूढ़तम सिद्धांतों को जनसाधारण के लिए सरल भाषा में निरूपित कर अत्यंत सुगम बना दिया है। यद्यपि इस ग्रंथ पर लोगों द्वारा अनगिनत भाष्य एवं लेख लिखे गए हैं पर आज की अतिद्रुत जीवन शैली को देखते हुए श्री महाराज श्री ने इसके सार को एक वाक्य में समझा दिया - तन कार में, मन यार में। 

इसी तरह की सरल शैली में श्री महाराज श्री द्वारा रचित राधा गोविंद गीत 11,111 दोहों में सारे वेद, शास्त्र, पुराणों का एक अद्भुत समागम है। उसी का एक अंश जिसमें गीता का सार दिया गया है, प्रस्तुत किया जा रहा है।  यहां पर भी दैनिक जीवन पर आधारित कटहल काटने के उदाहरण से किस प्रकार श्री गुरुदेव ने कर्मयोग जैसे महत्वपूर्ण सिद्धांत को स्पष्ट कर दिया!

गीता का सार

पार्थ ने दयावश गोविंद राधे।

कहा था युद्ध नहिं करूँगा बता दे॥२३५७॥

कृष्ण ने कहा पार्थ गोविंद राधे।

ऐसी दया अनार्यजुष्ट बता दे॥२३५८॥

कृष्ण ने कहा पार्थ गोविंद राधे।

ऐसी दया अस्वर्ग्य बता दे॥२३५९॥

 कृष्ण ने कहा पार्थ गोविंद राधे।

ऐसी दया महापाप बता दे॥२३६०॥

कर्म करते हुए गोविंद राधे।

मन ते मनन हरि कठिन बता दे॥२३६१॥

 जग के कर्मों में गोविंद राधे।

सबते कठिन कर्म युद्ध है बता दे॥२३६२॥

 कृष्ण ने कहा पार्थ गोविंद राधे।

मन मुझमें तन युद्ध में लगा दे॥२३६३॥

 गीता का सार यही गोविंद राधे।

युद्ध कर्म कर मन हरि में लगा दे॥२३६४॥

 मन का ही कर्म कर्म गोविंद राधे।

तन का किया कर्म कछु फल ना दे॥२३६५॥

 इन्द्रियों ते कर्म करे गोविंद राधे।

मन ते हो भक्ति कर्मयोग बता दे॥२३६६॥

रथ की धुरी जैसे गोविंद राधे।

स्थिर हो तो रथ पहिया चला दे॥२३६७॥

ऐसे मन हरि में हो गोविंद राधे।

तन ते हो कर्म कर्मयोग बता दे॥२३६८॥

हाथ में लगा के तेल गोविंद राधे।

कटहल काटो हाथ लिप्त ना बता दे॥२३६९॥

कर्म बाँधे बंधन गोविंद राधे।

कर्मयोग कर्म-बंधन को छुड़ा दे॥२३७०॥

अनासक्त धर्म करो गोविंद राधे।

मन हरि-शरण हो साधन बता दे॥२३७१॥

- राधा गोविंद गीत

 

अधिक जानकारी के लिए - https://www.jkpliterature.org.in/radha-govind-geet-vol-i-ii

 

**शीघ्र आ रही है - गीता ज्ञान पर एक विशेष श्रृंखला**

Leave your comment
Comments
12/25/2020 12:06 PM
Radhe Radhe
12/25/2020 12:18 PM
अद्भुत सार - श्री महाराजजी द्वारा - जय हो गुरुवर
12/25/2020 9:58 PM
Radhey Radhey