Divya Swarth

The true self-interest of every soul
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Pages: 204
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धन्य सोइ जोइ स्वारथ पहिचान।
स्व शब्दार्थ ‘आत्मा’ जानिय, अर्थ अर्थ सब जान।
परमात्मा को अंश आत्मा, वेद पुरान बखान।
आत्महिं अर्थ-सिद्धि परमात्महिं, इहै ज्ञान को ज्ञान।
परमात्मा रस-रूप वेद कह, सोइ रस स्वारथ मान।
सोइ स्वारथरत जोइ ‘कृपालु’ रत, चरनन श्याम सुजान॥
प्रेम रस मदिरा
— जगद्​गुरु श्री कृपालु जी महाराज

जगद्​गुरु श्री कृपालु जी महाराज द्वारा प्रकटित ‘प्रेम रस मदिरा’ में १००८ पद हैं। आनन्दकन्द श्रीकृष्ण चन्द्र को भी क्रीतदास बना लेने वाला उन्हीं का परमान्तरंग प्रेम तत्त्व है तथा यही अन्तिम तत्त्व है, उसी को लक्ष्य बनाकर ‘प्रेम रस मदिरा’ ग्रन्थ लिखा गया है। यह ग्रन्थ भक्ति रस साहित्य में अद्वितीय है। सम्पूर्ण ग्रन्थ में कहीं भी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष तथा सकाम भक्ति को किंचित् भी स्थान नहीं दिया गया है।
प्रत्येक पद या तो भक्ति सम्बन्धी शास्त्रीय सिद्धान्तों को निरूपित करता है अथवा श्री राधा कृष्ण की विभिन्न लीलाओं का रसपान कराता है।

प्रत्येक पद की व्याख्या साधारण बुद्धि से सम्भव ही नहीं है।
भगवद् रसिक रसिक की बातें रसिक बिना कोउ समुझ सकै न।
अकारण करुण गुरुवर ने अपनी दिव्य वाणी को जन साधारण को बोध गम्य कराने के लिए स्वयं ही कुछ पदों की व्याख्या की है।

उपर्युक्त पद की व्याख्या में आचार्य श्री ने ‘स्वार्थ’ शब्द की व्याख्या करते हुये समझाया है कि ‘सच्चा स्वार्थ’ क्या है उसकी प्राप्ति का क्या साधन है। प्रस्तुत पुस्तक में उनकी यह महत्वपूर्ण प्रवचन शृंखला प्रकाशित की जा रही है। सभी साधकों के लिए परमोपयोगी है। यह ‘प्रवचन माधुरी’ शृंखला में १६ नं. की पुस्तक है।

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