Devotion to God and Guru

Daily Reflection
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Pages: 264
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बार बार पढ़ो, सुनो, समझो

पुस्तक के नाम से ही पुस्तक का विषय स्पष्ट हो जाता है। आवृत्तिरसकृदुपदेशात् - इस ब्रह्मसूत्र के द्वारा जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने प्रत्येक साधक के लिये तत्त्वज्ञान की परिपक्वता परमावश्यक बताई है तदर्थ गुरु का उपदेश बार बार सुनो, बार बार पढ़ो। कभी यह न सोचो मैं सब समझता हूँ, मुझे सब पता है। जितनी बार पढ़ोगे उतनी ही परिपक्वता आयेगी और पतन से बचे रहोगे। तत्त्वज्ञान को सदैव साथ रखो। तत्त्वज्ञान विस्मरण न होने पाये।

इस ब्रह्मसूत्र का प्रमाण देते हुए श्री महाराज जी ने बार बार तत्त्वज्ञान  श्रवण का उपदेश दिया है। प्रस्तुत पुस्तक में उनके प्रवचनों के कुछ अंश संकलित किये गये हैं।

हरि गुरु स्मरण

हरि गुरु भजु नित गोविन्द राधे।      
भाव निष्काम अनन्य बना दे॥

इस दोहे में श्री महाराज जी ने समस्त शास्त्रों वेदों का सार भर दिया है। इसकी व्याख्या उन्होंने अनेक बार नये नये ढंग से की है, जिससे हर साधक इसमें छिपे गूढ़ भावार्थ को आत्मसात करके उसका पालन कर सके। प्रस्तुत पुस्तक में उनके द्वारा की गई इस दोहे की व्याख्याओं को संकलित किया गया है। अतः पुस्तक का नाम, ‘दैनिक चिन्तन’ दिया गया है। व्याख्याओं को इस प्रकार से व्यवस्थित किया गया है कि आप अपनी साप्ताहिक दिनचर्या निर्धारित कर सकते हैं रविवार से प्रारम्भ कीजिये और निश्चय कीजिये सोमवार, मंगलवार... प्रत्येक दिन श्री महाराज जी की दिव्य वाणी का अनुसरण करते हुए दिन व्यतीत करेंगे। साथ ही मानव देह की क्षणभंगुरता से सम्बन्धित दोहों की व्याख्या भी संकलित की गई है।

इस पक्ष को भी श्री महाराज जी ने पुनः पुनः प्रकाशित किया है। जिससे साधक साधना में लापरवाही न करके, तेजी से आगे बढ़ने का प्रयास करें यह सोचकर कि अगला क्षण मिले या न मिले।

प्रत्येक साधक के लिए इसका पठन और मनन परमावश्यक है। श्री महाराज जी ने भी यही निर्देश दिया है कि सब लोग इस दोहे को रट लो। ‘इस दोहे में मैनें अपनी सारी फिलॉसफी रख दी है।’

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