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'मदर्स-डे' (8 मई) विशेष

  • By राधा गोविंद समिति

आज मदर्स-डे पर आइये अपनी सनातन शाश्वत माँ श्रीराधारानी के गुणों का स्मरण करें, जो हमारे हृदय को भयमुक्त करने वाले हैं। वेद-शास्त्र में यह सत्य उद्घोषित है कि हम सभी उन्हीं की संतान हैं। वे हमारी पालनहार, रखवार आदि सब हैं। मदर्स-डे पर उनका स्मरण करते हुये करुण-क्रन्दन पूर्वक रोकर उनसे प्रेम, कृपा और उनकी सेवा प्राप्त करने की याचना करें।

निम्नांकित पद भक्तियोगरसावतार जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज द्वारा विरचित 'प्रेम रस मदिरा' ग्रन्थ के 'प्रकीर्ण-माधुरी' खण्ड से लिया गया है। 'प्रेम रस मदिरा' ग्रन्थ में आचार्य श्री ने कुल 21-माधुरियों (सद्गुरु, सिद्धान्त, दैन्य, धाम, श्रीकृष्ण, श्रीराधा, मान, महासखी, प्रेम, विरह, रसिया, होरी माधुरी आदि) में 1008-पदों की रचना की है, जो कि भगवत्प्रेमपिपासु साधक के लिये अमूल्य निधि ही है। इसी ग्रन्थ का यह पद है, जिसमें श्रीराधारानी के गुणों का वर्णन है। आइये हम इसके प्रत्येक शब्द पर गंभीर विचार करते हुये लाभ प्राप्त करें,

 

श्री राधे हमारी सरकार, फिकिर मोहिं काहे की 

 

हित अधम उधारन देह धरें,

बिनु कारन दीनन नेह करें,

जब ऐसी दया दरबार, फिकिर मोहिं काहे की 

 

टुक निज-जन क्रन्दन सुनि पावें,

तजि श्यामहुँ निज जन पहँ धावें,

जब ऐसी सरल सुकुमार, फिकिर मोहिं काहे की 

 

भृकुटि नित तकत ब्रह्म जाकी,

ताकी शरणाई डर काकी,

जब ऐसी हमारी रखवार, फिकिर मोहिं काहे की 

 

जो आरत 'मम स्वामिनि !' भाखै,

तेहि पुतरिन सम आँखिन राखै,

जब ऐसी 'कृपालु' रिझवार, फिकिर मोहिं काहे की ।।

 

सरलार्थ : जब किशोरी जी हमारी स्वामिनी (एवं माँ भी) हैं तब मुझे किस बात की चिंता है? जो पतितों के उद्धार के लिए ही अवतार लेती हैं एवं अकारण ही दीनों से प्रेम करती हैं। जब हमारी स्वामिनी के दरबार में इतनी अपार दया है, तब मुझे किस बात की चिंता है? हमारी स्वामिनी जी अपने शरणागतों की थोड़ी भी करुण पुकार सुनते ही अपने प्राणेश्वर श्यामसुन्दर को भी छोड़कर अपने जन के पास तत्क्षण अपनी सुधि बुधि भूलकर दौड़ आती हैं। जब हमारी किशोरी जी इतनी सुकुमार और सरल स्वभाव की हैं, तब मुझे किस बात की चिंता है? ब्रह्म श्रीकृष्ण भी जिनकी भौंहे देखते रहते हैं अर्थात् प्यारे श्यामसुन्दर भी जिनके संकेत से चलते हैं, उनकी शरण में जाकर फिर किसका भय है? जब ऐसी स्वामिनी जी हमारी रक्षा करने वाली हैं, तब मुझे किस बात की चिंता है? जो शरणागत होकर आर्त होकर दृढ़ निश्चयपूर्वक 'मेरी स्वामिनी जी !' ऐसा कह देता है, उसे स्वामिनी जी अपनी आँखों की पुतली के समान रखती हैं। 'श्री कृपालु जी' कहते हैं कि जब हमारी स्वामिनी जी शरणागत से इतना प्यार करती हैं तब मुझे किस बात की चिंता है?

 

संदर्भित पुस्तकें

  1. प्रेम रस मदिरा

 

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संबंधित पुस्तकें

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