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वर्ष के अंतिम दिन हमको क्या करना चाहिये? भाग - 3

जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज ने निम्नांकित प्रवचन 31 दिसम्बर सन 2006 को अपने श्रीधाम बरसाना स्थित रँगीली महल आश्रम में दिया था, जिसमें उन्होंने मानव-जीवन के महत्व, उद्देश्य और जीवन की क्षणभंगुरता पर विशेष रूप में प्रकाश डाला था और गत वर्ष में हुई लापरवाहियों को दूर करते हुये नववर्ष में अधिकाधिक भगवद-चिन्तन का अभ्यास करने का संकल्प करने का आग्रह किया था। उन्होंने इस व्याख्यान के लिये एक दोहे की रचना की थी। नीचे वह दोहा तथा उसकी व्याख्या के भाग 3 का आप सभी पाठक-जन लाभ लेवें...

साल साल बीता जाय गोविन्द राधे।

अब तो हठीलो मन हरि में लगा दे।।

(स्वरचित दोहा)

एक आगरे के इंजीनियर साहब थे, जिन्होंने हमारा सत्संग भवन बनवाया है मनगढ़ का। वो रात में सोये और सबेरे नहीं उठे। किसी को मालूम ही नहीं हुआ। अरे भई, क्या हुआ? सोते सोते हार्ट फेल हो गया। तो ये तो काल है। समय आ गया तो काल आपको एक सेकण्ड का समय नहीं देगा। जाना होगा। कोई भी हो। 'राजा, रंक, फकीर' कोई भी हो। सबको जाना होगा। सिद्ध महापुरुष को भी जाना होगा। मायाबद्ध की कौन कहे? 

कोई हँसते हुये जाय, कोई रोते हुये जाय। अरे, भगवान भी आते जाते हैं। ग्यारह हजार वर्ष जब पूरा हो गया राम का तो यमराज गया राम के पास कि महाराज! याद दिलाने आया हूँ आपको टाइम। भक्तों के प्यार में भूल गये हो, ग्यारह हजार वर्ष। तो आपका टाइम हो गया, आप जितने दिन को आये थे। अब आपकी इच्छा हो तो रहो वो मैं नहीं कहता। 

इसलिये कल नया वर्ष होगा। उसकी खुशी तभी मनाओ, जब नये वर्ष में मन को जबरदस्ती भगवान में लगाओ। वो लगेगा नहीं, लगाना होगा। इस भरोसे से तुम बैठे रहे अनादिकाल से अब तक, लगेगा, लगेगा। क्यों लगेगा? तुम संसार में लगा रहे हो, अभ्यास कर रहे हो, संसार में लगाने का और लगे भगवान में? ऐसा कैसे? जिसमें लगाने का अभ्यास करोगे उसी में लगेगा न। बड़ा सुन्दर वेदव्यास ने एक श्लोक में कहा है,

 

विषयान् ध्यायतश्चित्तम् विषयेषु विषज्जते।

मामनुस्मरतश्चित्तम्    मय्येव    प्रविलीयते।।

(भागवत 11-14-27)

संसारी विषय में सुख का चिन्तन करोगे बार बार, तो उसमें अटैचमेन्ट हो जायेगा और मुझमें सुख का चिन्तन करोगे बार बार तो मुझमें अटैचमेन्ट हो जायेगा। बस चिन्तन करने का मामला है। जितना अधिक चिन्तन होगा, उतना अधिक अटैचमेन्ट होगा। वो चिन्तन हमें बढ़ाना है। बस इतनी सी बात है।

 

संदर्भित पुस्तक

कृपालु भक्ति धारा (भाग - 3)

 

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