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वर्ष के अंतिम दिन हमको क्या करना चाहिये? भाग - 2

जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज ने निम्नांकित प्रवचन 31 दिसम्बर सन 2006 को अपने श्रीधाम बरसाना स्थित रँगीली महल आश्रम में दिया था, जिसमें उन्होंने मानव-जीवन के महत्व, उद्देश्य और जीवन की क्षणभंगुरता पर विशेष रूप में प्रकाश डाला था और गत वर्ष में हुई लापरवाहियों को दूर करते हुये नववर्ष में अधिकाधिक भगवद-चिन्तन का अभ्यास करने का संकल्प करने का आग्रह किया था। उन्होंने इस व्याख्यान के लिये एक दोहे की रचना की थी। नीचे वह दोहा तथा उसकी व्याख्या के भाग 2 का आप सभी सुधि पाठक-जन लाभ लेवें...

साल साल बीता जाय गोविन्द राधे।

अब तो हठीलो मन हरि में लगा दे।।

(स्वरचित दोहा)

देखो! पॉलिटिक्स में सब पार्टियाँ इलैक्शन वगैरह के बाद अपनी अपनी पार्टी की गतिविधियों का विश्लेषण करती हैं, आत्म निरीक्षण करती हैं कि हम क्यों हारे? हमने ऐसा क्या गड़बड़ किया? हमारे द्वारा ऐसा क्या हुआ? क्या खामी थी, उसको हम ठीक करें। तो ऐसे ही हमको भी साल के अंत में बहुत अधिक आत्म-निरीक्षण करना चाहिये। हर महीने भी हमें एक बार करना चाहिये और हो सके तो डेली दो-तीन मिनट सोते समय सोचना चाहिये, आज हमने क्या किया? अच्छा क्या किया, बुरा क्या किया? संसार में मन कितना लगाया, भगवान में कितना लगाया।

अगर रोज सोचें तो अगले दिन गड़बड़ी कम होती जाय, फिर महीने में सोचें तो अगले महीने में और कम हो जाय लेकिन हम मरते मरते भी नहीं सोचते। निर्भय! हाँ, हमको मरना थोड़े ही है। अरे, अभी तो क्या हम नब्बे साल के ही हैं। अरे, क्या खयाल है तुम्हारा, सौ वर्ष। अच्छा चलो, मान लिया। दो सौ वर्ष के हो गये, अच्छा चलो मान लिया। उसके बाद क्या होगा?

तो ये जो आत्म निरीक्षण है उसमें आप पायेंगे कि हमने बहुत लापरवाही की, लेकिन अभी चांस है। एक डी. एम. थे तो वो अपना हाल बता रहे थे कि मैं एक कंपीटिशन में बैठा लिखने के लिये, तो सोचते सोचते नींद आ गई और एक घण्टे सोता रहा। एक घण्टे बाद जब नींद खुली, तो आधा घण्टा बचा था समय, तो जल्दी जल्दी लिखा और फेल हो गया। लेकिन आधा घण्टा तो कम से कम मिल गया उसको। हम तो मृत्यु के समय तक भी नहीं सोचते। तो कब बनायेंगे? इधर (संसार) का बनाने का तो बहुत सोचते हैं। हाँ, बेटे का बन जाय, बीबी का बन जाय, पोते का बन जाय, इसका भी बन जाय, उसका भी बन जाय, सब अरबपति हो जायें। ये बहुत सोचते हैं।

आत्मा का कमाने का मामला सोचो। तुम आत्मा हो, शरीर नहीं हो। शरीर को तो छोड़ना पड़ेगा, जबरदस्ती छुड़वाया जायेगा शरीर। इसलिये हर साल आत्म निरीक्षण करो और फील करो, और अगले साल की तैयारी करो कि अब की साल काम बना लेना है। क्या पता पूरा साल न मिले। छः महीने ही मिले, एक महीना ही मिले।

 

क्षणभंगुर जीवन की कलिका,

कल प्रात को जाने खिली न खिली।

कल सबेरा हो न हो!

 

संदर्भित पुस्तक

कृपालु भक्ति धारा (भाग - 3)

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वर्ष के अंतिम दिन हमको क्या करना चाहिये? - 1

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आत्मरक्षा

साधक सावधानी


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