Bhagavat-tattva

Sanskrit titles and core teachings explained
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Pages: 100
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अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजन शलाकया।
चक्षुरु न्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नम:॥

पचासवें जगद्गुरु दिवस का हार्दिक अभिनन्दन।
निखिलदर्शनसमन्वयाचार्य भक्ति योगरसावतार जगद्​गुरु श्री कृपालु जी महाराज के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।
जगद्​गुरु श्री कृपालु जी महाराज पंचम समन्वयवादी जगद्​गुरु हैं। पूर्ववर्ती चारों जगद्​गुरुओं एवं अन्य आचार्यों के सिद्धान्तों का विलक्षण समन्वय करके भक्ति योग का प्राधान्य सिद्ध करने वाले, आचार्य श्री कलिमलग्रसित अधम जीवों को बरबस ब्रजरस में डुबो रहे हैं। सभी जाति सभी सम्प्रदायों के लोगों का एकीकरण करके दिव्य प्रेम का सन्देश जन जन तक पहुँचाने के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर रहे हैं। प्रस्तुत स्मारिका भगवत्तत्व में उनके सिद्धान्तों का निरूपण करने का प्रयास किया गया है। यद्यपि उनके द्वारा प्रकट ज्ञान समुद्रवत ही है तथापि इस पुस्तक में संक्षिप्त वर्णन है कि किस प्रकार से आचार्य श्री सभी आचार्यों का सम्मान करते हुये श्री कृष्ण भक्ति द्वारा विश्व बन्धुत्व की भावना दृढ़ कर रहे हैं।
कलि के प्रधान धर्म श्री कृष्ण संकीर्तन की शिक्षा देकर जीवों का उद्धार करने वाले हे करुणावतार ! जगद्​गुरु कृपालु आपको कोटि-कोटि प्रणाम।
हम जैसे कृतघ्नी, पामर, पाषाण हृदयी जीवोें को भी श्री कृष्ण भक्ति मार्ग पर अग्रसर करने वाले भक्तियोगरसावतार जगद्​गुरु कृपालु आपको कोटि-कोटि प्रणाम! हे पतितपावन! दीनबन्धु! कृपासिन्धु! जीवोेें के प्रति आपकी अहैतुकी कृपा को कोटि-कोटि प्रणाम!!!!

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