Bhagavad Bhakti (H)

Devotional practice while living in the world
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Pages: 96
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कलियुगी जीवों को बरबस ब्रजरस में सराबोर करने वाले भक्तियोगरसावतार अकारण करुण कृपालु महाप्रभु जीव-कल्याणार्थ भगीरथ प्रयास कर रहे हैं। 87 वर्ष की आयु में भी देश-विदेश के कोने-कोने में स्वयं जाकर भगवद्बहिर्मुख जीवों को श्रीकृष्ण सन्मुखता का दिव्य-सन्देश देकर अनन्त दिव्य नित्यानन्द का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।

चैतन्य महाप्रभु ने जिस रस को प्रवाहित किया था, अब पुन: श्री कृपालु महाप्रभु उसी दुर्लभ रस को कलियुगी जीवों को पिला रहे हैं। नित्य नवीन, सरल सरस मधुरातिमधुर रचनाओं के द्वारा भक्ति सम्बन्धी शास्त्रीय ज्ञान नवीन-नवीन प्रकार से निरूपित करके मन्द बुद्धि वालों के मस्तिष्क में भी बैठाना उनके व्यक्तित्व की बहुत बड़ी विशेषता है। श्री नवद्वीप धाम में श्री महाराज जी ने -

हरि अनुराग हो या गोविन्द राधे।
जग विराग हो हो मन से बता दे॥

इस स्वरचित दोहे की व्याख्या करते हुये बताया कि वास्तविक भक्ति किस प्रकार की जाय जिससे अन्त:करण शुद्धि होने पर दिव्य भक्ति प्राप्त करके जीव श्रीकृष्ण की नित्य सेवा प्राप्त कर सके।

4 जनवरी 2007 से 11 जनवरी 2007 तक प्रत्येक दिन इस दोहे की व्याख्या श्री महाराज जी द्वारा की गई। प्रस्तुत पुस्तक में यह प्रवचन शृंखला प्रकाशित की जा रही है।

नवद्वीप धाम में अनमोल रत्न बिना मोल के मिल गया। लूटने वालों ने खूब लूटा। आप भी ‘भगवद्-भक्ति’ नाम की इस पुस्तक के द्वारा इस अमूल्य धन को लूट लीजिये।

प्रवचन यथार्थ रूप में ही प्रस्तुत किये जा रहे हैं। अंग्रेजी के शब्दों का भी हिन्दी अनुवाद नहीं किया गया है, इस भावना से कि गुरुदेव के श्री मुख से नि:सृत खजाना मौलिक रूप में ही संजोकर रखा जाय।

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